सुबह के आठ बज रहे थे। समय से पहले कार्यालय पहुँचने की मेरी पुरानी आदत है, इसलिए मैं दफ्तर आ चुका था। लाइन पर काम करने वाले कर्मचारी अभी तक नहीं आए थे। उस पसरे हुए सन्नाटे में, पिछली रात की वह खौफनाक घटना मेरे ज़ेहन में किसी डरावने साये की तरह अब भी घूम रही थी। उसे याद करते ही मेरे रोंगटे खड़े हो जाते थे। मेरे सभी लाइनमैन आस-पास के गाँवों में ही रहते थे। मैं बड़ी बेताबी और घबराहट के साथ उनके आने का इंतज़ार कर रहा था। मेरे मन में सवालों का एक बवंडर था—मुझे कुछ पूछना था, कुछ जानना था। बस तस्दीक करनी थी कि कल रात इन आँखों ने जो देखा, क्या वह वाकई सच था, या फिर मेरी किसी खौफनाक कल्पना का हिस्सा…
मैं महाराष्ट्र राज्य विद्युत बोर्ड में उप-अभियंता (Junior Engineer) के पद पर कार्यरत हूँ। मेरे कार्यक्षेत्र में आस-पास के लगभग बीस गाँव आते हैं। हर गाँव में बिजली की सुचारू व्यवस्था बनी रहे, यह सुनिश्चित करना मेरी ज़िम्मेदारी है। इसी के तहत, हर महीने इन गाँवों में लगे सभी ट्रांसफॉर्मर्स का लोड टेस्ट करना होता है।
पिछली रात लाटवण गाँव के क्षेत्र में लगे ट्रांसफॉर्मर्स की लोड टेस्टिंग का काम तय था। इस काम के लिए उस क्षेत्र में नियुक्त कर्मचारी, श्रीमान वाईल के साथ उनकी मोटर साइकिल पर जाना निर्धारित हुआ था। शाम लगभग छह बजे हम कार्यालय से निकले। सात बजे हमने काम शुरू किया और करीब आठ बजे तक सभी ट्रांसफॉर्मर्स का लोड टेस्ट पूरा कर लिया। श्रीमान वाईल का घर वहीं थोड़ी दूरी पर था। उन्होंने बहुत ही अपनेपन से रात का खाना उनके घर ही खाने का आग्रह किया। मैं घर पर अकेला ही रहता था, इसलिए उनके इस स्नेह भरे आग्रह को ठुकरा न सका। हम दोनों उनके घर चले गए। खाना खाने के बाद, हम श्रीमान वाईल और उनकी पत्नी के साथ बातों में इतने मशगूल हो गए कि वक्त के बीतने का अहसास ही नहीं हुआ। जब समय देखा तो रात के साढ़े नौ बज चुके थे और मेरी वापसी के लिए आखिरी बस भी छूट चुकी थी।
मैंने वाईल से अनुरोध किया कि वह मुझे अपनी मोटर साइकिल से घर तक छोड़ दे। यह सुनते ही वाईल के चेहरे पर एक अजीब सी घबराहट तैर गई। उसने दबी हुई आवाज़ में कहा कि रास्ते में एक घना जंगल और एक श्मशान घाट पड़ता है। “जाते वक्त तो हम दोनों साथ होंगे साहब, लेकिन लौटते वक्त मैं बिल्कुल अकेला रह जाऊंगा,” उसने हिचकिचाते हुए कहा। उसने उस श्मशान घाट से जुड़ी कई खौफनाक और रूह कंपा देने वाली कहानियाँ सुन रखी थीं। उसकी बात सुनकर मेरे भीतर भी एक सिहरन सी दौड़ गई। मैंने एक पल के लिए सोचा कि क्यों न रात यहीं वाईल के घर ही गुजार लूँ। लेकिन उनका घर काफी छोटा था, इसलिए संकोचवश मेरे होंठ सिल गए।
तभी वाईल ने एक ऐसा प्रस्ताव रखा जिसने मेरी धड़कनें बढ़ा दीं। वह बोला, “साहब, अगर आपको डर न लगता हो, तो आप मेरी मोटर साइकिल ले जाइए। कल सुबह मैं कार्यालय से ले लूंगा। वैसे भी श्मशान घाट की ये कहानियाँ मनगढ़ंत ही होती हैं, इनमें भला क्या सच्चाई होगी!” अब मेरे पास उसकी मोटर साइकिल ले जाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं बचा था। अपने चेहरे पर उभर आई दहशत को छिपाते हुए मैंने एक झूठी मुस्कान के साथ कहा, “तुम भी कितने डरपोक हो वाईल, भला कहानियों से भी कोई डरता है!” वाईल चुप रहा और उसने मोटर साइकिल की चाबी मेरी ओर बढ़ा दी। मैंने भी बिना कुछ कहे, एक अनजाने खौफ के साथ चाबी थाम ली।
मोटर साइकिल स्टार्ट की और अपने दिल के किसी कोने में दुबके डर को दबाते हुए मैं उस अंधेरे सफर पर निकल पड़ा। कुछ दूरी तक गाँव के इक्का-दुक्का घर नज़र आए। स्ट्रीट लाइट की हल्की पीली रोशनी सुकून दे रही थी। उस दौरान मैंने खुद में थोड़ी हिम्मत भी जुटा ली थी, लेकिन मैं जानता था कि यह राहत चंद पलों की है। कुछ ही दूरी पर वह डरावना जंगल शुरू होने वाला था। धीरे-धीरे गाँव पीछे छूटने लगा और जंगल का स्याह अंधेरा मुझे निगलने लगा। सर्दियों का मौसम था, सर्द हवाएं जिस्म को चीरती हुई गुज़र रही थीं। पर सच कहूँ तो उस काली रात और श्मशान घाट की खौफनाक कहानियों का खौफ मेरे ज़ेहन पर इस कदर हावी था कि उस कंपा देने वाली ठंड का अहसास ही नहीं हो रहा था। चारों ओर ऐसा घुप्प अंधेरा था जैसे किसी ने स्याही बिखेर दी हो। रोशनी के नाम पर सिर्फ मेरी मोटर साइकिल की हेडलाइट थी जो उस अंधेरे को चीरने की एक नाकाम कोशिश कर रही थी। उस भयानक सन्नाटे में सिर्फ मोटर साइकिल के इंजन की आवाज़ गूँज रही थी, और मेरा डरा हुआ मन उस आवाज़ के पीछे किसी और अनदेखी, डरावनी आवाज़ को टटोल रहा था।
तभी दूर से मुझे एक मशाल जैसी कोई चीज़ सुलगती हुई दिखाई दी। मेरे दिल की धड़कनें बेकाबू होने लगीं। जैसे-जैसे मैं नज़दीक पहुँचा, मुझे एहसास हुआ कि मैं उसी खौफनाक श्मशान घाट के करीब आ गया हूँ। और वह कोई मशाल नहीं थी… बल्कि लकड़ियों के ढेर में दबा एक इंसानी शव जल रहा था। चिता की उठती लपटें उस अंधेरे में एक खौफनाक मंज़र पेश कर रही थीं।
अब मैं साफ-साफ अपने सीने में धड़कते दिल की आवाज़ सुन सकता था। मेरा खौफ तब अपनी हदें पार कर गया जब मैंने देखा कि उस जलती हुई चिता के आस-पास चीखने-रोने वाला या अंतिम विदाई देने वाला एक भी इंसान या रिश्तेदार मौजूद नहीं था। उस वीराने में अकेले जलती उस लाश ने मेरी रूह कंपा दी। मेरे मन ने यह मान लिया कि ज़रूर कोई अतृप्त, भटकती हुई रूह मुझे यह खौफनाक नज़ारा दिखा रही है, और अगले ही पल वह मुझ पर हमला कर देगी। डर मेरी रगों में जम रहा था, लेकिन मैंने मन ही मन तय कर लिया था कि चाहे कोई कितनी भी डरावनी आवाज़ आए, चाहे कोई मुझे पीछे से पुकारे, मैं गलती से भी पलटकर नहीं देखूंगा। अगर सामने कोई आ भी गया, तो भी मोटर साइकिल नहीं रोकूंगा। मेरी साँसें अटकी हुई थीं और धीरे-धीरे वह श्मशान घाट पीछे छूट रहा था। मैंने अपना सिर बिल्कुल नहीं घुमाया, बस अपनी आँखों के कोनों से उस जलती हुई लाश के आस-पास किसी इंसानी साये को ढूँढने की कोशिश करता रहा। लेकिन वहाँ राख और लपटों के सिवा कुछ नज़र नहीं आया।
गनीमत रही कि मेरा घर नज़दीक आ गया था। घर थोड़ी ऊंचाई पर था, जहाँ मोटर साइकिल नहीं जा सकती थी। अब मुझे अपनी गाड़ी नीचे ही छोड़कर उस अंधेरी, सुनसान गली से होते हुए पैदल घर तक पहुँचना था। पड़ोस के घर भी थोड़ी दूरी पर थे। मैंने जल्दी से मोटर साइकिल खड़ी की और तेज़ कदमों से, तकरीबन दौड़ते हुए अपने घर के दरवाज़े तक पहुँच गया। कांपते हाथों से मैंने अपनी जेबें टटोलीं और घर की चाबी निकाली। मेरे हाथ इतने थरथरा रहे थे कि ताला खोलने में भी मशक्कत करनी पड़ी।
घर के भीतर कदम रखते ही मैंने झटके से दरवाज़ा बंद किया और कसकर कुंडी लगा दी। घर में रखी लकड़ी की उस इकलौती कुर्सी पर मैं धड़ाम से बैठ गया और एक लंबी चैन की साँस ली। पसीने और ठंड से तर-बतर कपड़े बदले और सोने के लिए अपना बिस्तर लगा लिया। रात के तकरीबन दस बज चुके थे। उस खौफ के साये में आज मुझे अंधेरे से भी डर लग रहा था, इसलिए मैंने कमरे की लाइट जलती ही छोड़ दी। बिस्तर पर लेटने के बाद भी मेरा दिमाग शांत नहीं था। बार-बार वही एक भयानक ख्याल मुझे डरा रहा था—उस वीरान श्मशान में जलते हुए शव के पास आखिर एक भी इंसान क्यों नहीं था? मुझे बस किसी तरह सुबह होने का बेकरारी से इंतज़ार था। इस रहस्य का जवाब मुझे मेरे कार्यालय जाकर ही मिल सकता था। सभी लाइनमैन सुबह हाज़िरी देने आते थे, और उन्हें गाँव की छोटी-से-छोटी खबर रहती थी। मुझे यकीन था कि वे लोग ज़रूर बताएंगे कि वह बदनसीब लाश किस घर की थी, और उसके घरवाले उसे लावारिस जलता छोड़कर इतनी जल्दी वहाँ से क्यों चले गए थे। डर के साये में वह रात काटना किसी सज़ा से कम नहीं था, लेकिन आखिरकार मेरी थकान मेरे उस खौफ पर हावी हो गई, और मेरी आँख लग गई।
…और अब सुबह हो चुकी थी।
एक-एक करके लाइनमैन कार्यालय में दाखिल होने लगे। मेरी बेचैनी अब बर्दाश्त से बाहर हो रही थी। जैसे ही कोई आता, मैं उससे एक ही सवाल पूछता— “कल गाँव में किसकी मौत हुई थी? वह कौन था जिसका शव कल रात टिडे गाँव के श्मशान घाट पर जलाया जा रहा था?”
मेरा सवाल सुनकर सभी लाइनमैन एक-दूसरे का मुँह देखने लगे और आपस में फुसफुसाते हुए चर्चा करने लगे। कुछ देर की उस खामोश चर्चा के बाद, उन सबने मिलकर मुझे जो जवाब दिया, उसने मेरे पैरों तले ज़मीन खिसका दी।
उनका जवाब था—
“साहब, कल गाँव में किसी की मौत नहीं हुई। कल गाँव में कोई शव नहीं जला।”
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