Tech & Tells Header

नजरिया – ३

ममता की जीत

“काफी दिन बीत गए हैं। मनसुख क्यों नहीं आया?” दादी के मुंह से ये बात सुनते ही नितिन के दिलो-दिमाग में मानो चिंगारी सी लग जाती थी।

“दादी, अब आप 93 साल की हो गई हो। मनसुख चाचा ने तुमसे मिलना तो दूर, कभी तुम्हारा हाल-चाल पूछने के लिए फोन भी नहीं किया है। शुरू से हम ही तुम्हारे साथ रहे हैं। अब पिताजी नहीं रहे, पर हमने आपका साथ नहीं छोड़ा है। क्यों हर दो दिन में मनसुख चाचा को याद कर अपना खून और हमारी जान जलाती हो? आपको यहाँ खाने-पीने की कोई कमी नहीं है और सभी आपकी इज़्ज़त भी करते हैं। पर आपका हर दो दिन में उन्हें याद करना मुझे कतई पसंद नहीं है।” आग-बबूला होते हुए नितिन ने दादी को खरी-खोटी सुना दी।

दादी भी क्या करतीं, एकटक आंसू भरी आँखों से नितिन को देखती रहीं। फिर नज़रें झुकाकर अपने खयालों में खो गईं।

अतीत की झलक: जमुना एक मेहनती औरत थीं। उनके तीन बेटे थे। पति ड्राइवर थे, थोड़ा-बहुत कमा लेते थे, पर इतने बड़े परिवार के भविष्य की उन्हें कोई फिक्र नहीं थी। रोज़ कमाना और रोज़ खाना—बस यही उनकी ज़िंदगी थी। पर जमुना अपने बच्चों के भविष्य को लेकर काफी चिंतित रहती थीं। उन्हें मालूम था कि पति की कमाई से बच्चों की परवरिश नहीं हो पाएगी। पैसे कमाने के लिए उन्होंने भी पति का हाथ बँटाने की ठान ली।

उन दिनों घर-घर बोतल से दूध पहुँचाना अनपढ़ लोगों के लिए कमाई का अच्छा ज़रिया था। जमुना को इसी काम से संतोष करना पड़ा। वह सुबह 5 बजे घर से निकल जातीं। लोहे के बक्से वाली एक हाथ-गाड़ी में दूध की बोतलें भरकर चुने हुए घरों में दूध पहुँचाना ही उनका काम था। उन दिनों ज़्यादातर चाल सिस्टम के घर हुआ करते थे। 3 या 4 मंज़िल की बिल्डिंगें भी काफी थीं, जिनमें लिफ्ट नहीं होती थी। जमुना को दूर-दूर तक पैदल चलना पड़ता था और कई घर चौथी मंज़िल पर होते थे, जहाँ उन्हें सीढ़ियाँ चढ़कर जाना पड़ता था।

काफी परिश्रम कर जमुना ने पैसे जोड़ने शुरू किए। जमुना को पैसे कमाते देख उनका पति अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति और ज़्यादा लापरवाह हो गया। बड़ा बेटा जतिन माँ की तकलीफ और मेहनत को भली-भांति समझता था। माँ की मदद के लिए जतिन ने ग्यारहवीं तक ही पढ़ाई की और आगे पैसे कमाना ही मुनासिब समझा। उसने रेडियो, टीवी और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को दुरुस्त करने का काम सीख लिया।

जतिन के बाद बाकी दो भाई भी बड़े हुए। तीनों भाइयों में सिर्फ मनसुख ही 12वीं कक्षा तक पढ़ाई पूरी कर पाया। तीसरे बेटे हरिलाल को पढ़ाई में कोई रुचि नहीं थी, उसने आठवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी और पिता के नक्श-ए-कदम पर चलकर ड्राइवर बन गया।

जब बेटे शादी के लायक हुए, तो जमुना को पता था कि एक ही घर में तीन बहुएँ आपस में नहीं निभा पाएँगी। यह बात उन्होंने जतिन से कही। जतिन कभी माँ की मर्जी के खिलाफ काम नहीं करता था। जमुना घर के हर छोटे-बड़े फैसले में जतिन को साथ लेती थीं क्योंकि उन्हें सलाह और मदद की उम्मीद सिर्फ उसी से थी। जतिन अपनी सारी कमाई माँ को दे देता था। दोनों ने मिलकर ज़मीन खरीदने के लिए पैसे जोड़े।

कहते हैं कि इच्छा प्रबल हो तो भगवान भी अवसर पैदा कर देते हैं। जल्द ही उन्हें पता चला कि उनके किराए के घर के पास ही एक खेत बिकाऊ है, जिसकी कीमत 3000 रुपये थी। उनके पास केवल 2000 रुपये थे। जमुना यह मौका छोड़ना नहीं चाहती थीं, इसलिए उन्होंने अपने शादी के गहने बेचकर वह ज़मीन खरीद ली। जतिन ने उसी ज़मीन पर एक लकड़ी की केबिन लगा दी और अपना काम शुरू किया।

केवल मनसुख ही था जिसे नौकरी नहीं मिल रही थी। थोड़ा ज़्यादा पढ़ा-लिखा होने के कारण उसे ड्राइवरी या मैकेनिक का काम छोटा लगता था। तभी पता चला कि एक सरकारी कार्यालय में क्लर्क की भर्ती निकली है। वहाँ अधिकारी ने 500 रुपये की रिश्वत माँगी। जमुना के पास अब एक धेला भी नहीं बचा था, पर मनसुख की ज़िद के आगे विवश होकर उन्होंने कुछ शुभचिंतकों से उधार लिया और उसे पैसे दिए।

वक्त गुज़रा, जमुना ने मेहनत कर सबका उधार चुकाया और बेटों का विवाह किया। घर में कलह शुरू हुई तो जमुना ने उसी ज़मीन पर तीन अलग मकान बनाने की ठानी। एक ठेकेदार मगन भाई की मदद से उन्होंने वहां मकान बनवाए। जमुना ने अपने तीनों बेटों को घर दे दिए, पर खुद के लिए कोई घर नहीं रखा। वह जतिन के साथ ही रहना चाहती थीं।

दुखों का पहाड़: कुछ महीने बीते थे कि दूसरे बेटे हरिलाल ने शराब के नशे में आत्महत्या कर ली। जमुना उसकी पत्नी अनुराधा और बच्ची की मदद के लिए उनके साथ रहने लगीं। यह बात मनसुख को खटकने लगी और उसने माँ से दूरियाँ बना लीं।

समय बीतता गया, नितिन (जतिन का बेटा) बड़ा हुआ और उसे सरकारी नौकरी मिल गई। वह अपने माता-पिता और दादी के साथ नए घर में रहने लगा। उधर, अनुराधा की बेटी बड़ी हुई और कमाने लगी, तो अब उन्हें बूढ़ी जमुना बोझ लगने लगी। जतिन की अचानक दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई, जिसने जमुना को तोड़कर रख दिया।

एक दिन अनुराधा और उसकी बेटी ने जमुना को उनके कपड़ों की पोटली के साथ घर से बाहर निकाल दिया। पड़ोसियों ने नितिन को खबर दी। नितिन वहां पहुँचा तो देखा कि जिस ज़मीन की मालकिन जमुना थीं, वहीं वह लावारिसों की तरह बरामदे में बैठी थीं। नितिन उन्हें अपने घर ले आया।

जब नितिन ने मनसुख को फोन किया, तो उसने लापरवाही से कह दिया, “आप लोग ही माँ के लाडले रहे हैं, आप ही संभालिए।” नितिन ने समाज के पंचों में शिकायत की। पंचों ने जमुना के पक्ष में फैसला सुनाया, लेकिन जमुना केवल अपने बच्चों का प्यार चाहती थी, कानूनी जीत नहीं।

अंतिम मिलन: दादी की हालत बिगड़ती जा रही थी। उनके शरीर की त्वचा इतनी कोमल हो गई थी कि छूने पर भी खून निकल आता था। उनकी आखिरी इच्छा मनसुख से मिलने की थी। नितिन के एक परिचित सज्जन मनसुख को समझा-बुझाकर ले आए।

उस दिन मनसुख आया, दादी के लिए जलेबी लाया और बहुत देर तक बातें कीं। जमुना बहुत खुश थीं। उन्होंने कहा, “अब मेरी कोई इच्छा बाकी नहीं है, अब मैं चैन से मर सकती हूँ।”

अगले दिन सुबह जब नितिन दादी के पैर छूने गया, तो उन्होंने कोई हलचल नहीं की। जमुना सदा के लिए सो चुकी थीं। उनकी ममता की डोर ने उन्हें तब तक थामे रखा जब तक उन्होंने अपने रूठे हुए बेटे का चेहरा नहीं देख लिया।

सच ही कहा गया है—पुत्र कुपुत्र हो सकता है, पर माता कुमाता नहीं हो सकती।

Leave a Reply

Discover more from Tech & Tales

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading