नजरिया – २
रोज़ की तरह आज भी प्रमोद ऑफिस से शाम को निर्धारित समय पर घर आया। फ्रेश होकर बैठा ही था कि उसकी माँ ने गरमा-गरम चाय और साथ में कुछ नमकीन लाकर दे दी। दिन भर की थकान मिटाने के लिए टीवी के सामने चाय की चुस्कियां लेना और नमकीन खाना, प्रमोद के लिए दिन का सबसे सुनहरा मौका होता था।
करीब आधा घंटा बीता होगा कि डोरबेल बजी। प्रमोद ने दरवाजा खोला, तो सामने उसकी पत्नी प्रमिला खड़ी थी। चेहरा पसीने से भीगा और थका हुआ था। उसके हाथ में एक भारी थैला था, जिसमें सब्जियां और घर का कुछ ज़रूरी सामान भरा था। यह उसका नित्यक्रम था—रोज़ दफ्तर से लौटते वक्त बाज़ार से घर की ज़रूरतें पूरी करते हुए आना।
प्रमोद ने उसे बस एक “Hi” कहा। प्रमिला ने भी थके हुए स्वर में “Hi” कहकर प्रत्युत्तर दिया और सीधे किचन की ओर बढ़ गई। प्रमोद फिर से टीवी देखने में मशगूल हो गया। कुछ ही क्षणों में बेडरूम के अंदर से प्रमिला के डांटने की आवाज़ सुनाई दी। प्रमोद ने जाकर देखा, तो उसकी दोनों बच्चियां—रीना और टीना—सिर झुकाए बुत के समान प्रमिला के सामने खड़ी थीं। प्रमिला उन्हें बुरी तरह फटकार रही थी। प्रमोद ने बच्चियों के पीछे खड़े रहकर इशारे से प्रमिला से पूछा, “क्या हुआ?”
क्रोधित स्वर में प्रमिला ने कहना शुरू किया— “सुबह घर का सारा काम करके दफ्तर जाती हूँ। शाम को लौटकर फिर नौकरानी की तरह काम में जुट जाती हूँ। क्या मैं इनसे ज़रा भी मदद की उम्मीद न करूँ? अभी-अभी थकी-हारी आई हूँ और देखो, सारा घर बिखरा पड़ा है! धुले हुए कपड़े अभी तक किसी ने अलमारी में नहीं रखे। क्या ये सब लोग मेरा ही इंतज़ार करते हैं कि कब मैं दफ्तर से लौटूँ और घर समेटूँ? क्या सफाई करना, सबके लिए खाना बनाना और फिर जूठे बर्तन धोना सिर्फ मेरी ही ज़िम्मेदारी है?”
प्रमिला बच्चियों की शिकायत कर रही थी, पर प्रमोद खुद भी अपराधबोध से भर गया। उसे लगा जैसे ये डांट उसके लिए भी थी। घर आकर वह भी नाममात्र का ही काम करता था। टीवी देखना, खाना और सो जाना—यही उसकी दिनचर्या थी। आखिर कोई कब तक सहे? प्रमिला ने कई बार बच्चों को घर के कामों में हाथ बंटाने के लिए समझाया था, पर उन्होंने कभी गंभीरता नहीं दिखाई। आज प्रमिला का सब्र जवाब दे गया था।
प्रमोद को लगा कि अगर वह वहां और रुका, तो एकाध फटकार उसे भी पड़ सकती है। उसने धीरे से कहा, “बच्चों! अब तुम दोनों थोड़े ज़िम्मेदार बनो। माँ पूरे दिन दफ्तर में काम करके घर आती है। सुबह भी सारा काम निपटाकर जाती है। कम से कम घर की सफाई का ध्यान तो तुम लोग रख ही सकते हो। शाम को घर आकर भी उसे खाना बनाना पड़ता है।” इतना बोलकर प्रमोद दबे पांव फिर से टीवी के सामने खिसक गया।
प्रमिला ने रोज़ की तरह भारी मन से खाना बनाया। उसे अपनी सास की मदद मिलती थी, पर उनकी उम्र का लिहाज़ करते हुए प्रमिला उनसे ज़्यादा काम नहीं करवाना चाहती थी।
अगले दिन शनिवार था। प्रमोद की छुट्टी थी, पर प्रमिला का दफ्तर चालू था। प्रमिला ने जाते-जाते प्रमोद से कहा— “सुनिए, आज मुझे दफ्तर थोड़ा जल्दी निकलना है। सुबह खाना बनाना मुमकिन नहीं हो पाएगा, मैं माँ जी से कहकर जा रही हूँ। बर्तन सुबह बच्चे साफ़ कर लेंगे और कपड़े मैंने वॉशिंग मशीन में डाल दिए हैं, बच्चे उन्हें रस्सी पर सुखा देंगे।” प्रमोद ने “हाँ” कह दिया। वैसे भी वह और क्या कहता? उसे लगा कि उसे तो कुछ करना नहीं है, बस बच्चों पर नज़र रखनी है।
अगले दिन प्रमोद देर तक सोता रहा। प्रमिला जल्दी निकल गई और जाते-जाते बच्चों को भी जगा गई। पर प्रमिला के जाते ही बच्चे “5 मिनट और” कहकर फिर सो गए। वे 5 मिनट कब एक घंटे में बदल गए, पता ही नहीं चला। जब वे उठीं, तो कॉलेज के लिए देर हो रही थी, इसलिए वे जल्दी-जल्दी तैयार होकर निकल गईं।
प्रमोद जब सोकर उठा, तो उसे अपनी ‘बेड-टी’ की याद आई, जो आज नहीं मिली थी। प्रमिला जल्दी निकल गई थी और आज माँ भी नहीं उठी थीं। आमतौर पर प्रमिला न हो, तो माँ प्रमोद का पूरा ख्याल रखती थीं। प्रमोद माँ को ढूँढने रसोई में गया, पर वहां कोई नहीं था। बाहर आकर देखा तो माँ अब तक सोई हुई थीं। प्रमोद को आश्चर्य हुआ—रोज़ सबको जगाने वाली माँ आज खुद कैसे सोई हुई हैं?
“माँ… उठो, नौ बज गए हैं,” प्रमोद ने आवाज़ लगाई। “बेटा, आज कुछ ठीक नहीं लग रहा। थोड़ा बुखार जैसा है, थोड़ा और आराम कर लेती हूँ,” माँ ने कमज़ोर आवाज़ में जवाब दिया।
प्रमोद ने माँ के माथे पर हाथ रखा, माथा गर्म था। “ठीक है माँ, आप आराम करो। मैं आपके लिए चाय और नाश्ता लाता हूँ, फिर एक दवाई ले लेना। दोपहर तक आराम मिल जाएगा।”
प्रमोद रसोई में पहुँचा, तो देखा कि रात के जूठे बर्तन वैसे ही पड़े थे और मशीन में धुले हुए कपड़े भी वहीं थे। उसने जैसे-तैसे ब्रेड-बटर और चाय बनाकर माँ को दी और उन्हें दवाई खिलाई।
अब प्रमोद के सामने घर के कामों का ढेर था। उसे ये सब काम ‘औरतों वाले’ या निम्न स्तर के लग रहे थे। मन तो नहीं था, पर माँ बीमार थी और बच्चियां कॉलेज गई थीं। प्रमिला शाम को आएगी और अगर काम पूरे नहीं मिले, तो वह किसी को नहीं बख्शेगी। यह सोचकर प्रमोद ने हिम्मत जुटाई और एक घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद घर के सारे काम निपटाए। जब वह काम खत्म कर बेड पर लेटा, तो पसीने से तर-बतर था।
तभी उसे याद आई प्रमिला से होने वाली वह रोज़ की बहस। प्रमिला जब रात को काम निपटाकर बेडरूम में आती थी, तो आते ही पंखा फुल स्पीड पर कर देती थी। प्रमोद को यह बुरा लगता था और वह कहता, “ज़रा भी गर्मी नहीं है, तुम्हें पता नहीं इतनी गर्मी क्यों लगती है!” तब प्रमिला पलटवार करती— “कभी घर के काम करके देखो, तब पता चलेगा।”
आज प्रमोद को समझ आया कि प्रमिला सच कह रही थी। दफ्तर के बाद घर का काम करना वाकई थका देने वाला होता है। अब दोपहर के खाने की बारी थी। प्रमोद को सिर्फ चाय और ऑमलेट बनाना आता था, पर आज उसने यूट्यूब की मदद ली।
उसने माँ से पूछ-पूछकर खिचड़ी, बेसन करी और आलू की सब्जी बनाई। सब्जी और करी उसने थोड़ी ज़्यादा ही बना ली ताकि रात को प्रमिला को आराम मिल सके। दोपहर तक माँ की तबियत सुधर गई, तो दोनों ने साथ बैठकर खाना खाया। खाना ठीक-ठाक ही बना था।
शाम को बच्चियां आईं, तो प्रमोद ने उनसे रोटियां बनवा लीं और कपड़े सहेजकर अलमारी में रखवा दिए। जब प्रमिला घर लौटी, तो घर बिल्कुल साफ-सुथरा था। वह थकान मिटाने सोफे पर बैठी, तो बच्चे उसके लिए पानी और चाय ले आए। प्रमिला की आँखें अब भी घर में कोई अधूरा काम ढूँढ रही थीं, जो रोज़ उसके लिए बचा रहता था, पर आज उसे कुछ नहीं मिला।
“यह सब्जी का थैला अंदर ले जाओ, मैं हाथ-मुँह धोकर खाना बना देती हूँ,” प्रमिला ने रीना को थैला थमाते हुए कहा। “खाना तैयार है,” प्रमोद ने मुस्कुराते हुए कहा। “क्या! सच में? माँ ने बनाया?” प्रमिला का चेहरा खिल उठा, उसकी थकान जैसे गायब हो गई। “नहीं, आज दोपहर मैंने ही ज़्यादा बना लिया था और शाम को रीना-टीना ने रोटियां बना दीं।”
प्रमिला को अपनी कानों पर विश्वास नहीं हुआ। वह रसोई में जाकर देख आई। खाना बनाना बड़ी बात नहीं थी, पर प्रमोद ने जो उसकी मदद के लिए हाथ बढ़ाया था, उस ‘नजरिये’ ने उसे प्रसन्न कर दिया था।
उस रात प्रमिला के चेहरे पर थकान नहीं, सुकून था। सोते समय प्रमिला ने मुस्कुराते हुए प्रमोद से कहा, “आप तो काफी अच्छा खाना बना लेते हैं।” प्रमोद ने भी हंसते हुए पूछा, “तो बताओ, कल क्या बनाएंगे?”
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