“जिम्मेदारी का अहसास”
रोज की तरह आज भी प्रमोद ऑफिस से शाम को निर्धारित समय पर अपने घर आया। फ्रेश हुआ, तब तक उसकी मां ने गरमा-गरम चाय बना कर दे दी और साथ में कुछ नमकीन भी। अपने दिन भर की थकान मिटाने के लिए यह एक सुनहरा मौका होता है—टीवी के सामने चाय लेकर बैठ जाना और साथ में नमकीन खाना।

कुछ आधा घंटा बीता होगा कि डोरबेल बजी। प्रमोद ने दरवाजा खोला। दरवाजे पर उसकी पत्नी प्रमिला थी। पसीने से भीगा और थका हुआ चेहरा, हाथ में भारी थैला था जिसमें सब्जियां और घर के लिए खरीदा हुआ कुछ जरूरी सामान था। यह उसका नित्यक्रम था। वह रोज दफ्तर से लौटते वक्त बाजार से सब्जी-तरकारी ले आती थी।
प्रमोद ने उससे “Hi” कहा। उसने भी प्रत्युत्तर में थके हुए स्वर में “Hi” कह दिया। प्रमिला किचन में चली गई और प्रमोद फिर से टीवी के सामने बैठ गया। कुछ ही क्षण में बेडरूम के अंदर से प्रमिला के डांटने की आवाज सुनाई दी। प्रमोद ने जाकर देखा कि उसकी दोनों बच्चियां, रीना और टीना, सिर झुकाए बुत के समान प्रमिला के समक्ष खड़ी हैं और प्रमिला उन्हें डांट-फटकार रही है। प्रमोद ने बच्चियों के पीछे रहकर इशारे से प्रमिला से पूछा—”क्या हुआ?”
क्रोधित स्वर में प्रमिला ने कहना शुरू किया— “सुबह घर का सारा काम करके दफ्तर जाती हूं। शाम को घर आकर फिर से मैं नौकरानी की तरह काम में जुट जाती हूं। क्या मैं इनसे किसी भी काम की उम्मीद न रखूं? मैं अभी-अभी थकी-हारी आई हूं और सारा घर बिखरा पड़ा है। धुले हुए कपड़े अभी तक किसी ने अलमारी में नहीं रखे। क्या ये लोग मेरा ही इंतजार करते हैं कि कब मैं दफ्तर से लौटूं और घर आकर बिखरा हुआ सामान समेटूं, सफाई करूं, खाना बनाऊं और फिर जूठे बर्तन साफ करूं?”
प्रमिला प्रमोद से बच्चियों की शिकायत कर रही थी, पर प्रमोद खुद भी अपराध बोध में आ गया था। उसे लगा कि यह डांट उसे भी पड़ रही है। घर आकर वह भी न के बराबर काम करता था। टीवी देखना, खाना और सो जाना—यही उसकी दिनचर्या रही थी। आखिर कोई कब तक सहे? प्रमिला ने बहुत बार दोनों बच्चों को घर के कामों में हाथ बँटाने के लिए समझाया था, पर उन्होंने जिम्मेदारी नहीं दिखाई थी। आज प्रमिला दफ्तर से बहुत थकी हुई आई थी, इसलिए घर की हालत देख कर वह बरस पड़ी।
प्रमोद को लगा कि अगर वह वहां ज्यादा देर रुका, तो एकाध फटकार उसे भी पड़ सकती है। उसने कहा, “बच्चियों, अब तुम दोनों थोड़ा जिम्मेदार बन जाओ। मां दफ्तर में भी पूरे दिन काम करके आती है। सुबह भी सारा काम निपटा कर जाती है, तो कम से कम सफाई का ध्यान तो तुम रख ही सकती हो। शाम को घर आकर उसे खाना भी पकाना होता है।” बस इतना बोलकर प्रमोद दबे पांव फिर से टीवी देखने चला गया।
प्रमिला ने आज भी हर रोज की तरह खाना बनाया। उसे अपनी सास की मदद मिलती थी, पर उनकी उम्र का लिहाज करते हुए प्रमिला उनसे ज्यादा काम नहीं लेती थी।
दूसरे दिन शनिवार था। प्रमोद की छुट्टी थी, पर प्रमिला का दफ्तर चालू था। प्रमिला ने प्रमोद से कहा— “सुनिए, कल मुझे दफ्तर थोड़ा जल्दी जाना है, सुबह खाना बनाना संभव नहीं होगा। मैं माजी से कह कर जाऊंगी। बर्तन बच्चे साफ कर लेंगे और कपड़े मैं वॉशिंग मशीन में लगा दूंगी, बच्चे उन्हें सुखाने डाल देंगे।” प्रमोद ने ‘हां’ कह दिया। वैसे भी वह और क्या बोलता, उसे लगा उसे खुद तो कुछ करना नहीं है। प्रमिला की उम्मीद बस इतनी थी कि प्रमोद इन कामों पर नजर रखे।
अगले दिन प्रमोद देर तक सोया रहा। प्रमिला जल्दी निकल गई और जाते-जाते बच्चों को जगा गई। प्रमिला के जाते ही बच्चे “5 मिनट” के लिए फिर सो गए। वह 5 मिनट कब 1 घंटे में बदल गए, पता ही नहीं चला। जब वे उठीं, तब तक उन्हें कॉलेज के लिए देरी हो रही थी। वे जल्दी-जल्दी तैयार होकर निकल गईं।
प्रमोद भी उठा। उसे ‘बेड टी’ की आदत थी, पर आज नहीं मिली। प्रमिला जल्दी चली गई थी और आज मां भी नहीं उठी थीं। आमतौर पर प्रमिला न हो तो मां प्रमोद का पूरा ख्याल रखती थीं। प्रमोद उन्हें ढूंढने रसोई में गया, पर वे वहां नहीं थीं। बाहर आकर देखा तो मां अभी तक सोई हुई थीं। यह आश्चर्य की बात थी, क्योंकि वे हमेशा सबको जगाती थीं।
“मां… उठो, नौ बज गए हैं,” प्रमोद ने आवाज लगाई। “बेटा, कुछ ठीक नहीं लग रहा है। थोड़ा बुखार है शायद, थोड़ा और आराम कर लेती हूं,” मां ने कमजोर आवाज में उत्तर दिया।
प्रमोद ने मां के माथे पर हाथ रखा, माथा गर्म था। “ठीक है मां, तुम आराम करो। मैं तुम्हारे लिए चाय-नाश्ता बना देता हूं, फिर दवा ले लेना। दोपहर तक आराम आ जाएगा।” इतना बोलकर प्रमोद रसोई में गया। वहां देखा तो रात के जूठे बर्तन पड़े थे और मशीन में धुले हुए कपड़े।
प्रमोद को पहले ये काम ‘महिलाओं वाले’ लगते थे। इच्छा तो नहीं थी, पर मां बीमार थीं और बच्चियां कॉलेज गई थीं। उसने सोचा कि अगर शाम तक काम न हुआ तो प्रमिला बच्चों के साथ उसे भी नहीं बख्शेगी। “रोज-रोज थो़ड़ी न करना है,” यह सोचकर उसने काम शुरू किया। उसे पूरा एक घंटा लगा और वह पसीने से तर-बतर हो गया।
उसे प्रमिला से होने वाली रोज की बहस याद आई। जब प्रमिला रात को काम निपटाकर कमरे में आती और पंखा फुल कर देती, तो प्रमोद चिढ़ जाता था— “इतनी भी गर्मी नहीं है, तुम्हें न जाने क्यों इतनी गर्मी लगती है!” तब प्रमिला कहती— “कभी घर के काम करके देखो, तब पता चलेगा।”
प्रमोद ने सोचा, “वाकई, यह बहुत कठिन है। दफ्तर के बाद यह सब करना सच में थका देने वाला है।” अब उसे दोपहर का खाना भी बनाना था। उसने यूट्यूब की मदद ली और मां से पूछकर खिचड़ी, बेसन करी और आलू की सब्जी बनाई। उसने सब्जी और करी थोड़ी ज्यादा बनाई ताकि रात को भी काम आ सके। दोपहर तक मां की तबीयत सुधरी, तो दोनों ने साथ खाना खाया।
शाम को बच्चियां आईं तो उनसे रोटियां बनवा लीं और कपड़े अलमारी में रखवा दिए। जब प्रमिला घर लौटी, तो घर साफ-सुथरा था। वह थकान मिटाने सोफे पर बैठी ही थी कि बच्चे चाय और पानी ले आए। प्रमिला की आंखें अब भी कोई अधूरा काम ढूंढ रही थीं, पर कुछ न मिला। “यह सब्जी की थैली अंदर ले जाओ, मैं खाना बना देती हूं,” प्रमिला ने रीना से कहा।
“खाना तैयार है,” प्रमोद ने मुस्कुराते हुए कहा। “क्या! सच में? क्या मां ने बनाया?” प्रमिला का चेहरा खिल उठा। “नहीं, मैंने दोपहर में ही ज्यादा बना लिया था और शाम को बच्चों ने रोटियां बना दीं।”
प्रमिला को विश्वास नहीं हुआ। वह रसोई में देख कर आई। खाना बनाना उसके लिए बड़ी बात नहीं थी, पर प्रमोद का हाथ बँटाना उसे बहुत सुकून दे गया।
रात को सबने जल्दी खाना खाया। प्रमिला बहुत खुश थी। सोते समय उसने प्रमोद से चिढ़ाते हुए कहा— “आप तो अच्छा खाना बना लेते हैं… तो फिर कल क्या बनाएंगे?”
“जिम्मेदारी का अहसास” तब होता है जब व्यक्ति अपनी क्रियाओं और चुनावों के परिणामों को समझता है। यह सिर्फ अपने कार्यों के लिए जिम्मेदार होने का नहीं, बल्कि समाज, परिवार और अपने आस-पास के लोगों के प्रति अपने दायित्वों को भी महसूस करने का एक महत्वपूर्ण पहलू है। जब हम अपनी जिम्मेदारियों का अहसास करते हैं, तो हम न केवल अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाते हैं, बल्कि दूसरों के जीवन को भी प्रभावित करते हैं। यह अहसास हमें आत्म-नियंत्रण एवं अनुशासन सिखाता है, और साथ ही हमें हमारे लक्ष्यों को प्राप्त करने में मदद करता है। इसलिए, जिम्मेदारी का यह अहसास हमारे व्यक्तिगत विकास और सामूहिक संस्कृति के लिए अत्यंत आवश्यक है।