पेहले नही डरता था। अब डर लगता है

    दोपहर का खाना खाकर मै दफ्तर हाज़िर हो गया था । सारे लाइन मन अपने-अपने कार्य क्षेत्र लोट चूके थे । कुछ कागद्दी काम पूरा कर रहा था। मै अपने काम मे व्यस्त था। तभी एक बुज़ुर्ग आदमी दफ्तर मे दाखिल हुआ । कार्य पूछने पर घर में बिजली का कनेक्शन लेना है ये बताया। काम मे व्यस्त होने के कारण मैंने  बगल मे पड़ी कुरसी की और दिखाते हुए उनसे थोड़ी देर इंतजार करने को कहा। बुजुर्ग  कुरसी पर बैठ गय़े। कुछ ही क्षणों मेंने अपना  कार्य पूरा कर उनसे बातें शुरू कर दी। 

    उनहोने बताया कि उनहोने उनके लडके के लीये नया झोपडा बनाया है। उसीमे उनको बिजली का कनेकशन लेना है। मैने उनको नये कनेकशन का आवेदन प्रपत्र देते हुए, उनको जरुरी कागजात की सूची भी दे दी। सुची तो उन्होंने ले ली, पर लीखाई मे कमजोरी के कारण आवेदन प्रपत्र भरने मे असमर्थता बताई। मैने उनको आश्वासन दिया की जब वे जरुरी कागजात ले आयेंगे तब मैं उन्हें प्रपत्र भरने मे सहायता करुंगा। वे सूची ले कर वहां से चले गए।

    दुसरे दीन उसी समय वे वापस आये। उन्होंने लाये हुए सारे कागजात मैंने चेक कर लिए। वे सारे सही थे। मैने आवेदन प्रपत्र भरना शुरु किया। साथ ही साथ बातों का सिलसिला भी शुरु हुआ। मैने उनसे उनका गांव व व्यवसाय पूछा। वह नजदीक ही केलवत गांव मे रेहते थे। केलवत गांव मे लगी पानी की टंकी भरनेका काम वे करते थे। मैने उनसे ज्यादा जानकारी पूछी, तब उन्होंने बताया कि वह सुबह चार बजे केलवत गांव के पहाड़ पर लगाया हुआ पानी का पंप चालु करते है। पंप का स्वीच टंकी के बगल मे ही एक पक्की कैबीन मे लगायी हुई है। कैबीन ताला बंद है, जिसकी चाबी उनही के पास रेहती है। इस काम के लिए ग्राम पंचायत उनको तनख्वाह देती थी।  

    कुछ सात बजे तक, मतलब तकरीबन तीन घंटे मे टंकी भर जाती है, तब वे पंप बंद कर देते हैं, और पंप की कैबीन को फिर ताला लगा देते है। यही उनका रोज का काम था। 

    मै जरा चौंक गया था। सुबह के चार बजे…,ईतने घने अंधेरे मे…। कुतुहल वश मैने उनसे पूछा। आपको डर नही लगता, इतने घने अंधेरे मे, जंगल से होते हुए…। 

    कुछ रुकते हुए उन्होंने बताया, “पेहले नही डरता था। अब डर लगता है”। मेरी कलम रुक गयी, अब तक प्रपत्र भरते हुए, बगैर उनकी तरफ देखे मै उनसे बाते कर रहा था। पर उनका वह कथन सुनते ही, मैने एक तरफ कलम रख दी। मैने उनसे पूछा, आपने एसा क्यों कहा कि अब डर लगता है, क्या आपने कोइ अनहोनी देख ली है क्या। बुजुर्ग ने कहा हां कुछ ऐसा ही समझीए। हमेशा से डरावनी कहानियों मे मेरी रुची रही है। मैने उनसे आग्रह किया, वे उस अनहोनी पर प्रकाश डाले। 

    अब तक वह बुजुर्ग मेरे साथ सहज हो गये थे, उन्होंने बताया, “साहब कहानी थोडी लंबी है”। मैने घड़ी देखी, साढे तीन बजे थे, अभी दो घंटे का समय था मेरे पास। मैने उनसे कहा, मै आपका प्रपत्र भर रहा हुं, तब तक आप कहानी जारी रखीये। उन्होंने कहानी बतानी शुरू कर दी।

    “मै केलवत गांव मे ही रेहता हुं, पर मेरे घर से पंप काफी दुर है। सो मै घर से साढे तीन बजे ही निकल जाता हूं। उस दिन मैं घड़ी के बिगड़ने के वजह से शायद कुछ जल्दी ही घर से निकल गया था। हमेशा का रास्ता था, पर उस दिन का अंधेरा कुछ ज्यादा ही काला लग रहा था। गांव के बाहर निकलते ही मैन सड़क आ गई थी। सड़क पार करते ही जंगल शुरु हो गया था। हमेशा की तरह बगैर किसी डर के मैं आगे बढ़ रहा था।

    कैबीन से करीब करीब १०० फूट की दूरी पर एक १५ फूट चौड़ा पूल नदी पर बांधा हुआ था। उसे पार करके मुझे कैबिन तक पहुंचना था। ज्यों ही मै पूल के किनारे पहुंचा, पूल के दुसरे किनारे पर मुझे तीन छोटी मनुष्य आकार दीखाई दीए। मेरे पैर वहीं जम गये। वह सिर्फ आकार थे। पूरे सफेद, ना तो उनका मुंह था, ना हाथ, ना पैर। उनकी ऊंचाई तकरीबन दो फुट रही होगी, एक छोटे बच्चे जैसी। मै काफी डर गया था। कोई भी दिशा में बढ़ने की हिम्मत नहीं हो रही थी। शायद उन तीनों परछाईं ने भी मुझे देख लिया था। वे भी वहीं रुक गई थी। कुछ ऐसा नज़र आ रहा था, जैसे तीनों आपस में कुछ बात कर रही हो। मेरी धड़कन तेज हो गई थी। मेरी हिम्मत ने जवाब दे दिया था। 

    पर मेरी हिम्मत तब बढ़ी, जब मुझे एक अंदाजा आया कि वह तीनों शायद मुझसे डर के वही रुक गई थी। अब तीनों परछाई में से पहली परछाई पूल पर आगे बढ़ी। मेरे रोंगटे खड़े हो गए थे। पर मै जगह से टस से मस नहीं हुआ। डर था कि मेरे हीलते ही वे मुझपर हमला कर देंगी। वह मेरी तरफ आगे बढ़ी। धीरेसे मेरे बगलसे होते हुए आगे निकल गयी। मै उसकी और देखता रहा। कुछ ही दुरी पर जाने के बाद एक पेड़ के पीछे अद्रष्य हो गयी। अब मुझे एहसास हो चुका था कि, वह परछाईंसे मुझे कोई धोखा नहीं। अब दूसरी परछाईं आगे बढ़ी। वह भी मेरे बगल से होती हुई आगे बढ़ गई। उसी पेड़ के पीछे अद्रष्य हो गयी। अब मुझमें काफी हीम्मत आ गई थी, ये सोचकर कि वे परछाईं मुझसे डर रही है। अब मै वह तीसरी परछाईं का इन्तजार करने लगा। कि कब वह मेरे बगल से गुजरे, और कब मैं उसे डराउ।”

    उनका यह कथन सुनकर मै अपने आपको रोक ना सका। बीच ही उनको रोक कर पूछ बैठा। “चाचा, आप सच बोल रहे है ना, या अपनी और से कोई मसाला डाल रहे है”। बुज़ुर्ग अपनी आप बीती बताने में पूरे उत्तर चुके थे। मानो वह घटना अभी दोबारा जी रहे हो। मेरे टोकने पर वह थोड़े विचलित हुए और बोले, “हा साहब, आप सही सोच रहे है, पर मै गलत नहीं बोल रहा हूं। जब तक मुझे लग रहा था, की वह परछाइयां मुझसे नहीं डर रही , तब तक मै उनसे डरता रहा। और जब एहसास हुए की वह मुझसे डर रही है, तब मै उनको डरानेकी सोचने लगा, वह मेरी भूल थी”। उनकी सोच सुनकर मुझे इंसानी कमजोरी का एहसास हुआ। पर तसल्ली हुई कि उन्होंने अपनी गलती भी मान ली।मैंने उनको उनकी कहानी आगे बढ़ने कहा। बुज़ुर्ग फिर अपनी कहानी में खो गए।

    “मै उस तीसरे परछाई का इंतजार करने लगा। शायद वह तीसरी परछाई ने भी मेरी नजर पढ़ ली थी। वह ज्यादा देर तक वही रुकी रही। कुछ देर बाद उसने आगे बढ़ना शुरू किया। उसकी गति काफी धीमी थी। वह जैसे ही मेरे बगल से गुजरने लगी। मैंने उसके आकार में उसका कान कहा होगा उसका अंदाजा लिया। और उसका कान खिचनेकी कोशिश करी। वह बेचारी छोटे बच्चे की तरह अपना कान बचाते हुए मेरे इर्द गिर्द घूमने लगी। मै भी मजे ले रहा था उसकी बेबसी का। पर मुझे ये ख्याल ना आया कि कुछ ही पलों में जो परछाई अंदाजन २ फुट की थी वह ४ फुट की हो गई थी। अब मै डर गया था। पर अब उसका कान भी नहीं छोड़ सकता था। डर था कि कान छोड़ते ही वह मूझपर हमला ना कर दे। इन्हीं उलझन में अब उसका कद मेरे जीतना, ५ फुट तक बढ़ गया। अब उसका जोर भी काफी बढ़ा हुआ महसूस हुआ। डर के मारे मुझे पता ना चल रहा था कि अब मै क्या करू, बहुत बड़ी गलती कर बैठा था मै। इसी दौरान, उस परछाई ने बहोत ही डरावनी चीख निकाली। मेरे पसीने ही छूट गए। कुछ पल के लिए दिल की धड़कन ही रुक सी गई। उसका कान छोड़ कर बिजली कि तेजी से पूल से होते हुए मै केबिन की और दौड़ा। केबिन तक पहोचते ही चाबी निकाली और तला खोलने लगा। पर मेरी नजर उस परछाई पर ही टिकी थी। जो अभी भी पूल के दूसरे किनारे खड़ी थी। ऐसा लग रहा था मानो मेरे और ही देख रही हो। अब उसका कद काफी बड़ा नजर सा रहा था। मन मे यही डर था कि किसी भी क्षण वह दौड़के आएगी और बदला लेगी। मैंने कैबिन का दरवाजा खोल दिया और अन्दर घुस गया। कैबिन काफी छोटी थी, पर मै अन्दर समा गया था। कुंडी लगानेकी कोशिश कर रहा था। पर कैबिन के अन्दर से कुंडी नहीं थी। अब डर और बढ़ गया था,  काफी आसान शिकार बन गया था मै। पूरे जोर से मैंने दरवाजा अंदर से खींच रखा था। दरवाजे में एक छेद था, उसमे से पुल का सिर्फ ये किनारा ही नजर आ रहा था। अब मन् में ख्याल दौड़ने लगे, की वह परछाई क्या कर रही होगी। अभी भी वही खड़ी होगी, या मेरे तरफ आगे बढ़ रही होगी। काश मै दूसरा किनारा भी देख पाता। 

    काफी देर हुई, सन्नाटा कायम रहा। शायद उस परछाई ने मेरा पीछा छोड़ दिया था। मन में ख्याल आया कि केबिन से बाहर निकलकर  देखूं, पर हिम्मत नहीं बन रही थी। समय का अंदाजा नहीं लग रहा था। पर ये तो मन में ठान लिया था, की जब तक सूरज की रौशनी कैबिन में नहीं आती, मै बाहर नहीं निकलूंगा।
    
    तकरीबन तीन घण्टे मै कैबिन के अंदर कैद रहा था। चिड़ियों की चहचहाहट शुरू हो गई थी। यह तय था कि उस परछाई ने मेरा पीछा छोड़ दिया था। पर इतना डरा हुआ था, की सूरज की रौशनी के बगैर मै बाहर नहीं निकलने वाला था। 
    
    अब सूरज कि रोशनी कैबिन के अंदर झांकने लगी थी। मैंने हिम्मत की, दरवाजा खोला। बाहर झांका, काफी उजाला था। अब बाहर आ गया। पूल के दोनों किनारे साफ़ थे। मैंने पंप शुरू कर दिया। टंकी भरने तक वही बैठा रहा। अपनी मूर्खता को कोसता रहा।”

    बुज़ुर्ग की कहानी खत्म हो चुकी थी। थोड़ी देर हम दोनों खामोश रहे। मैंने पूछा, आप अभी भी सुबह साढ़े तीन बजे घरसे निकलते है। उन्होंने मुस्कुराते हुए हामी भरी, और कहा, “डर अभी भी है, वह पुल नजदीक आते आते आज भी जान गले तक आ जाती है। पर मेरी रोजी रोटी को नहीं छोड़ सकता। पर मै इस बात का पूरा ख्याल रखता हूं कि मैं साढ़े तीन से पहले घर से ना निकलू”।

    मैंने उनका आवेदन प्रपत्र भर लिया, और उनके बाकि के कागजात जोड़के रख लिए। १० दिन में बिजली का कनेक्शन देनेका वादा करके उनको विदा किया।

Leave a comment