कॉलेज का आखरी साल था। हम पांच दोस्तो का ग्रुप था। मै, कल्पेश, मानेक, जिग्नेश, विक्रम। मुझे छोड़ सारे पढ़ाई को काफी संजीदगी से लेते थे, मै हसी ठिठोली मै ज्यादा वक़्त बिताता था। मेरे पढ़ाई की अरुचि को लेकर दोस्तो से काफी अन बन होते रहती थी, पर मैंने कभी भी उनकी बात गंभीरता नहीं ली थी।
अब आखरी साल था। पता नहीं अब रोज रोज मिलना होता है कि नहीं। मैंने सोच लिया था, की ऐसा कोई मजाक किया जाए कि उम्र भर सारे दोस्त मुझे याद रखे। मार्च महीना खत्म होने आया था। मौका अच्छा आने वाला था। अप्रैल फूल की आड़ लेते हुए कोई भी मज़ाक किया जा सकता था। अगर किसीको मजाक पसंद ना आया, तो “अप्रैल फूल बनाया” बोलकर गुस्से की अग्नि को दबाया जा सकता था।
मेरा दोस्त विक्रम लड़कियों से काफी दूर दूर रहा करता था। लड़कियां पसंद तो थी उसे, पर बात करने से डरता था वह। मैंने सोचा कि क्यों ना उसका ही मजाक बनाया जाए। कयो ना हो, मेरे हाथ उसकी एक कमजोरी लगी थी।
विनीता…, विनीता भी हमारे ही क्लास में थी, और उसका घर विक्रम के घर से काफी नजदीक भी था। कॉलेज से छूटते ही हम पाचो दोस्त, विनीता और सुरुचि सभी साथ साथ विले पारले रेलवे स्टेशन तक जाते थे। बीच ही में रेलवे फाटक आता था, जहासे विनीता, सुरुचि और विक्रम हमसे अलग हो जाते थे। वाहासे तीनों आगे साथ साथ जाते थे।
मैंने ये ताड़ लिया था कि विक्रम विनितासे काफ़ी प्रभावित था। उसे पसंद करता था वह। पर अपने दिल की बात उस से तो दूर, हम दोस्तो को भी नहीं बताई थी। मैंने तरकीब सोचनी शुरू कर दी थी। पहली अप्रैल को जो अमल में लानी थी।
तरकीब मैंने सोच ली थी। कुछ ऐसा…. ।
कल्पेश और मानेक दोनों को अपने विश्वास में लिया। उन्हें बताया कि मै एक ग्रीटिंग कार्ड बनाऊंगा और विक्रम को भेजूंगा, जो कि विनीता की तरफ से होगा। प्रेम प्रस्ताव । दोनों ने साफ इनकार करते हुए कहा, “तुझे पढ़ाई में कभी भी रुचि रही ही नहीं है, बस ये सब ही सूझता रहता है। पर इस बार ये तू कुछ ज्यादा सोच रहा है। हम इसमें शामिल नहीं होंगे”। “घबराओ मत, कुछ नहीं होगा। सारी जिम्मेदारी मेरी। सिर्फ तुमको ये ही करना है कि विक्रम का पोस्टल एड्रेस निकाल कर मुझे दो, और जब वक़्त आए तब ये एक अप्रैल फूल था इसकी गवाही मेरे साथ दो”। काफी मुश्किल से माने।
दोनों ने बातो ही बातों में, विक्रम से उसके घर का पोस्टल एड्रेस निकाल ही लिया। मैंने आर्चीज गैलरी में जा कर एक अच्छा सा प्रेम प्रस्ताव वाला ग्रीटिंग कार्ड खरीद लिया। काफी सोचा। क्या लिखूं, की विक्रम को पुरी तरह विश्वास हो जाए कि यह कार्ड विनीता ने ही भेजा है, ना कि कोई मजाक। आखिर में ये ही सोचा की सिर्फ “I love you, from Vinita” इतना ही लिखना काफी है।
कुछ २५ तारीख को मैंने रेगूलर पोस्ट से पोस्ट कर दिया। ठीक ३१ मार्च को वह ग्रीटिंग कार्ड विक्रम के हाथ आ गया था। ये बात मुझे तब पता चली जब शामको घर पाहोचने के बाद पड़ोस में ही दुकान पर उसका टेलीफोन कॉल आया। जैसे ही मैंने हेल्लो बोला , विक्रम ने मुझे प्रताड़ना शुरू कर दिया। “क्या बदतमीजी है ये। तुमने ही कार्ड भेजा है ना ये मजाक वाला”। अब मै समझ गया। विक्रम sure नहीं था। एक अंदाजा लगाया था उसके की ये कार्ड मैंने ही भेजा होगा। कयो ना हो तीन साल साथ में गुजारे है कॉलेज में।
मैंने भी कुछ अनजान होते हुए, ऊंचे स्वर में उस है सवाल किया। “क्या हुआ। क्यों भड़के हुए हो इतना। शमको लौटते वक़्त तो ठीक थे”।
अब वह थोड़ा नरम हुआ। ” अरे मुझे एक लव कार्ड आया है। मुझे लगा कि तुमने ही भेजा होगा, मेरा मजाक करने”।
“पागल हो क्या। सारे मजाक का जिम्मा मैंने ही लिया है क्या। और मै क्यों तुमको ये लव कार्ड भेजु। अगर भेजना होता तो किसी लड़की को भेजता”। थोड़ा और चिढ़ते स्वर में मैंने उसे कहा।
अब विक्रम को विश्वास हो गया था, की वह कार्ड मैंने नहीं भेजा था। साथ ही साथ खुश भी हुआ था कि वह कार्ड विनीता ने ही उसे भेजा था।
“अरे बुरा मत मानो यार, भूल हो गई”। कुछ प्रसन्न से स्वर में उसने कहा।
अब बात आगे बढ़ते मैंने पूछा “क्या उस कार्ड में मेरा नाम लिखा है क्या”।
“नहीं तुम्हारा नहीं है। जाने दो। छोड़ो, कल बात करते है कॉलेज में”। इतना ही बोलकर उसने रिसीवर रख दिया।
मै काफी खुश था। जान गया था कि अब विक्रम का अप्रैल फ़ूल बन ही जाएगा।
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अध्याय एक समाप्त
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